धर्म का प्रकृति के साथ अनन्य संबंध है । जीव और जगत धर्म के दो छोर है जो धर्म बिंब से जुड़े हुए होते है ।धर्म की परिष्कृत दृष्टि वैचारिक चेतना के उन्नत रूप पर अवलंबित है । मनुष्य यौनि में धर्म तत्व का प्रभाव व्यष्टि से लेकर समष्टि रूप तक लक्षित होता है । धर्म आवरण में मनुष्य वैचारिक सीमाओं में कैद हो जाता है । चिंतन की मौलिकता का क्षय निरंतर होता जाता है । चेतना का स्थान भावना ग्रहण कर लेती है । आत्मनिर्भरता की बजाय इष्ट पर निर्भरता बढ़ जाती है जिसकी प्राप्ति न होने पर मानसिक अवसाद बढ़ता है । भगवद्भक्ति का काव्यमय रूप बौद्धिकता रहित होता है । तुलसी-सूर-कबीर के काव्य में बौद्धिकता की मात्रा न्यून है जबकि हृदय तत्व के उद्गारों का समावेश अधिक । कार्लमाक्स धर्म को ‘अफ़ीम’ की संज्ञा उसी रूप में देता है जब वह अंधरूप में अतिशयता ग्रहण कर लेता है । अति की दृष्टि में धर्म घातक है यदि वह सिर्फ कर्मकाण्ड पर अवलंबित है यह बात इतर है की अगर वह आध्यात्म पर आधारित है तो परिणाम सकारात्मक होते है ।

-गुरू धर्म में गुरु का बहुत महत्व होता है। वह ही हमें धर्मचक्षु प्रदान करता है ,हमारा पथप्रदर्शन करता है परन्तु इसमें यह ध्यान रखने की आवश्यकता है कि हम गुरू का चयन किस आधार पर करें ?
-हमें यह अवश्य जानना चाहिए की गुरू हमारी धार्मिक जिज्ञासाओं को तृप्त करने में योग्य है या नही ।
-गुरू बनाने से पूर्व गुरू की वैचारिक, पारिवारिक एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि अवश्य जान लेनी चाहिए ।
-गुरू के शिष्य बनकर शिक्षा ग्रहण करें भक्त बनकर भक्ति ना करें ।
-गुरू का कर्तव्य है की शिष्य की जिज्ञासाओं को शांत करें ।
-ज्ञानचक्षुओं को हमेशा खोल के रखे।
-स्वयं की तथा गुरू की दैनिक गतिविधियों का अवलोकन करते रहे ।

विशेष तर्क —-

-धर्म को तर्क की कसौटी पर रख कर ग्रहण करें ।
-धर्म, प्रकृति और विज्ञान का गहरा संबंध है अत: अपनी मानसिक ग्रहणशीलता पथ पर अग्रसर करें ।
-धर्म के मानवीय पहलू पर गौर करें क्योंकि ये सभी धर्मों का सार तत्व है ।
-धर्म का सार्वभौमिक उद्देश्य मनुष्य का नैतिक विकास और आतंरिक शान्ति है ।
-मन की तृष्णावृति का क्षय करके तृप्तवृति का प्रसार करना ही धर्म का अंतिम हेतु है ।
-खाद्य सामग्री का अतर्कपूर्ण धार्मिक उपयोग मिथ्या धर्म का परिचायक है ।
-कर्मकांड धर्म की विकृत अवस्था है ।
-समय के साथ धर्म में समाहित विकरूपताओं का शोधन कर व्यष्टिरूप में धर्मशुद्धि का महत्ती प्रयास आरम्भ करें ।
-धर्म सकारात्मक पथ पर औषधि है जबकि नकारात्मक पथ पर अफ़ीम ।

धर्म के कई रूप हो सकते है —-

यथा-भगवद् उल्लेखित धर्म, कुरुक्षेत्र के रण से प्राप्त धर्म , तुलसी का धर्म , कबीर का धर्म , छबरी का धर्म , उर्मिला का धर्म , सीता का धर्म , यशोदा का धर्म , मीरां का धर्म, नरसी मेहता का धर्म भीष्म का धर्म या धर्मराज का धर्म ।
धर्म की अनेक परिभाषाएँ गढ़ी जा सकती है और प्रत्येक परिभाषा एक ही मंजिल की ओर जाने वाली अलग राह की और संकेत करती है ।
अतः आप स्वयं तय करें की आप किस राह पर चलकर अपने इष्ट को प्राप्त करना चाहते है ।