किसी विराट चरित्र का चित्र उकेरना अर्थात लिपिबद्ध करना अत्यन्त दुश्कर है… और उससे भी अधिक महादुष्कर कार्य है किसी समय की गर्त में जानबूझकर दबा दिये गये देश-समाज के काम आये अनाम-अज्ञात आमजन की शहादत को सिद्ध करना। भारतवर्ष के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम 1857 क्रान्ति की आदिभुमि मेरठ से 10 मई 1857 को अंग्रेजी हुकुमत की फौज के 85 कैदी भारतीय सैनिकों को कैद से छुडाने के लिए लाइट कैबेलरी की तीसरी रेजिमेंट के बागी सिपाही मेरठ बन्दीगृह पर टूट पडे। 85 सैनिक क्रान्तिकारियों की बेड़ियाँ काट दी गयी। 1400 कैदियों को मुक्त कर दिया गया। यह भयंकर जनविद्रोह अंग्रेजी हुकुमत की आम जनता के प्रति कू्ररतापूर्ण आचरण के कारण फैला, जिसने शीघ्र ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में सनसनी फैला दी। तत्कालीन मेरठ जिले के बडौत – बागपत क्षेत्र में भी अंग्रेजों को खदेड दिया गया तथा क्रान्तिकारियों ने अपने इलाकों को आजाद घोषित कर दिया। परन्तु, क्रान्ति के तुरन्त बाद अंग्रेजी सरकार का दमनचक्र प्रारम्भ हुआ, जिसमें इस क्षेत्र के हजारों साधारण किसानो ने शहादत प्राप्त की। अपने साधारण कृषि यन्त्रों या हथियारों से अंग्रेजी हुकुमत के प्रशिक्षित हथियार व तोपो- रायफलों से युक्त फौज का मुकाबला करना उस समय के किसान क्रान्तिकारियों के अदम्य हिम्मत व देश-समाज के प्रति उनके जज्बे की अद्वितीय घटना व अप्रतिम उदाहरण हैं।

बडौत के निकटवर्ती बिजरौल गॉव निवासी बाबा शाहमल सिंह मावी ने देशखाप चौरासी मुखिया चौधरी श्यो सिंह के आह्वान पर, इस क्षेत्र में क्रान्ति की बागडोर सम्भाल कर गॉव-2 घूम कर देश को आजाद कराने का आह्वान किया, जिसके फलस्वरूप यहॉ का आमजन अंग्रेजी हुकुमत को जड से उखाड फैंकने के लिए उदृत हुआ। निरौजपुर गॉव के अचल सिंह गुर्जर, निम्बाली के गुलाब सिंह गुर्जर, बडौत के श्यो सिंह, ट्यौढी के ठाकुर गंगा बिशन सिंह, बिलौचपुरा के अल्ला दियां, बागपत के मेहताब खां, बागपत के कोतवाल वजीर खां, खेकडा के सूरजमल, हिलवाडी के पंडित रुडेराम, हिलवाडी के लाला सलेकराम, लाला मुइन, हरचन्दपुर के जफर व नादर खां, जौहडी के जयराम, जौनमाना के बदन सिंह, दोघट के आसकरण, हरजत, सिरसली के मेहरचन्द ढिकौली के कालू व ढिलसुख, बडौत के शेर सिंह, बुद्ध सिंह व हरगोपाल आदि विभिन्न जाति बिरादरी के मुखियाओं ने अपने-अपने समाज को क्रान्ति में भाग लेने के लिए प्रेरित करने की जिम्मेदारी ली तथा अंग्रेेजों के विरूद्ध साधारण किसानों की तकरीबन 8000 क्रान्तिकारियों की सेना का गठन किया, जो कि उस युग की एक असाधारण घटना है।

ब्रिटिश सरकार के तत्कालीन दस्तावेजों के अनुसंधान से पता चलता है कि इन क्रान्तिकारियों से हुकुमत इतनी अधिक भय खाती थी कि उनके दमन के लिए अंग्रेजों ने तोपों व रायफलों से युक्त फ्रांसीसी सैनिकों की टुकडियों को इस क्षेत्र में भेजा। ब्रिगेडियर विल्सन अपने सैनिकों के साथ 04 जून को अलीपुर पहुॅचे तथा इधर शाहमल के नेतृत्व मे क्रान्तिकारियों ने मेरठ से दिल्ली की अंग्रेजी फोजो को रसद व गोलों – बारूद से लदे 500 पशुओ को पकड लिया तथा अपना गुप्त मुख्यालय बनाई गई बासौद गॉव की जामा मस्जिद में अंग्रेजों से लूटा गया सारा अनाज व गोला बारूद एकत्र कर लिया।

मेरठ जेल से छूटे हुए सैंकडों दुर्दान्त क्रान्तिकारी के साथ इस क्षेत्र के करीब 3500 गुर्जवीर भी बासौद गॉव में आ जुटे। विचार विमर्ष के बाद निर्णय लिया गया कि यमुना के उस पार हरियाणा (तत्कालीन पंजाब) के राई गॉव तक वन पुल से अंग्रेजी रसद के पहुॅचने का एकमात्र मार्ग अवरूद्ध कर दिया जायें। निर्देष पाते ही हमारे क्रान्तिकारियों ने हथौडों व कुल्हाडियों से नावों को जोडकर बनाया हुआ पुल तोड दिया। जनरल हैबेट के आदेश पर फ़्रांसिसी सैनिको को क्रान्तिकारियों पर हमले के लिए डौला गॉव भेजा गया। 16 जुलाई, 1857 को अंग्रेज सैनिकों की टुकडी हिंडन नदी पार कर डौला गॉव पहुॅची परन्तु शाहमल अपने क्रान्तिकारी सैनिको को साथ लेकर डौला से अंग्रेजों को चकमा देकर अपने मुख्यालय बासौद गॉव की जामा मस्जिद पहुॅच गये। जहॉ मौजूद बासौद गॉव की मुस्लिम बाहुल्य क्रान्तिकारी जनता ने देश पर मरने मिटने की कसमें खाई। 17 जुलाई को अंग्रेजों की हथियार बन्द सेना तोपों के साथ बासौद गॉव तक पहुॅच गयी। परन्तु शाहमल और उनके क्रान्तिकारी साथियों को सुरक्षित बडौत की ओर नहर के किनारे-किनारे निकाल दिया गया।

अंग्रेजो ने भीषण रक्तपात बासौद के निवासियों का किया। डनलप ने अपनी खाकी रिसाला नामक पुस्तक में लिखा है कि बासौद गॉव के सभी बुढे व जवान अंग्रेजों से मुकाबला करने के लिए खडे हो गये है। संघर्ष हुआ जिसमें यहॉ के सैकडों क्रान्तिकारियों को मार डाला गया। 1857-58 के नैरेटिव ऑफ इवेंट्स दस्तावेजों में विवरण मिलता है कि बासौद गॉव की जामा मस्जिद को भी तोप के गोलों से उडा दिया गया तथा वहॉ मौजूद हजारों मन अनाज व गोला बारूद मे आग लगा दी गयी। उस समय बासौद की जामा मस्जिद में हाजी जी दिल्ली से आये हुए थे वह भी अंग्रेजों से लडते-लडते शहीद हो गये। बासौद में भयंकर कत्लेआम मचाकर अंग्रेज जन आगे बढे तो गॉव के बाहर तालाब के किनारे गॉव के बचे पुरुष क्रान्तिकारियों ने अंग्रेजों पर हमला किया, उन सबको भी चुन-2 कर मौत के घाट उतार दिया गया। नैरेटिव मे लिखा है कि सैंकडों बासौद निवासियों को मारने के बाद अन्य बचे 180 बासौद गॉव के क्रान्तिकारियों की भी शहादत वहॉ हुई। यह एक अदम्य साहस से भरी हुई भारतीय क्रान्तिकारियों की गौरव गाथा है जो कि विश्व के सर्वाधिक शक्ति सम्पन्न व प्रशिक्षित फौज को देखकर भी नही घबरायें तथा अपने शरीर की अन्तिम श्वास तक उनका मुकाबला किया।

बासौद गॉव की शाहदत 1857 क्रान्ति के संग्राम की सबसे बडी व अद्वितीय शाहदतपूर्ण घटना हैं। परन्तु अफसोस है कि 1857 से 1947 तक बासौद गॉव अंग्रेजी शोषण का शिकार रहा। यह गॉव अंग्रेजी हुकुमत में बागी घोषित कर यहॉ की समस्त जमीन जब्त कर उन्हें भूखा मरने के लिए छोड दिया।

1857 की क्रान्ति के 150 वें शहादत वर्ष 2017 में शहजाद राय शोध संस्थान की पहल पर आयोजित की गयी.. शहीद नमन यात्रा के दौरान 1857 के 150 वर्ष बाद प्रथम बार बासौद गॉव के शाहदत प्राप्त अज्ञात व समय की गर्त में भुला दिये गये सैंकडों शहीदों को श्रृंद्धांजलि दी गयी।

पुनः 160 वीं वर्षगाँठ के अवसर पर केन्द्र व राज्य सरकार से अपेक्षा है कि आजाद हिन्दुस्तान के चेहरे पर लगा यह कलंक धोने का साहस करे तथा बासौद गॉव की शाहदत को गौरवमयी श्रृंद्धांजलि दे तथा 1857 की तीर्थभूमि के रूप में यहॉ मौजूद जामा मस्जिद को मान्यता प्रदान करें ताकि आगामी पीढियों अपने गौरवमयी अतीत के प्रति जागरूक बनें।